यादगार पल

सुन के तुम्हें आज एक बोझिल अहसास हुआ, सुन के तुम्हें आज एक बोझिल अहसास हुआ, एक उम्र के ज़ाया होने का मलाल हुआ

सुन के तुम्हें आज एक बोझिल अहसास हुआ, एक उम्र के ज़ाया होने का मलाल हुआ

पहचान तो अपनी बरसों की है, पहचाना तुम्हें मैंने आज ही है

पल कोई याद रहे, ऐसा वक़्त गुज़ारा नहीं मैंने, नींद में मुस्कुराहट ले आए ऐसे सपने सजाए नहीं मैंने

पल कोई याद रहे, ऐसा वक़्त गुज़ारा नहीं मैंने, नींद में मुस्कुराहट ले आए ऐसे सपने सजाए नहीं मैंने

ये एहसास नया है, बोझिल है पर यादगार है, ये एहसास नया है, बोझिल है पर यादगार है

नींद में मुस्कुरा दूँ, ऐसा पल आज दिला दिया है तुमने,

तुम्हें आज पहचान लिया है मैंने, तुम्हें आज पहचान लिया है मैंने

तुम्हारी उड़ान

क्यूँ टोकता हूँ तुम्हें, ख़ुद मन की करता हूँ…क्यूँ रोकता हूँ तुम्हें

छोटी सी ही बात पर क्यूँ परेशान करता हूँ तुम्हें, प्यार करता हूँ तो जवाब क्यूँ माँगता हूँ, और फिर नज़रें क्यूँ नहीं मिला पाता हूँ

सुनोगी मेरी हमेशा ऐसा तो नहीं सोचता, करोगी मेरी कही ये भी नहीं जँचता, फिर क्यूँ ऐसा इंसान बन जाता हूँ मैं, तुमसे पहचाना भी नहीं जाता मैं

सपने तुम्हारे भी हैं ये क्यूँ भूल जाता हूँ, आशाएँ तुम्हारी मुझसे भी हैं वो वादे क्यूँ नहीं निभाता हूँ

परवरिश है ये या सदियों की सीख़, की रखूँ तुम्हें थोड़ा सा खींच, परवरिश है ये या सदियों की सीख़, की रखूँ तुम्हें थोड़ा सा खींच

माँ को भी देखा था पिसते इस पाटे के बीच, अहल्या, शकुंतला, सीता में भी शायद बोए गए थे इस सोच के बीज

संगिनी, जीवन तरिंगनि हो तुम ये समझता हूँ, मेरे अरमान तुमसे, तुम्हारे ख़्वाब मुझसे ये अहसास भी रखता हूँ

तोड़ रहा हूँ सदियों के भ्रम…तुम्हें दबाने का ये क्रम

प्यार तुमसे करता हूँ, तुम्हें भी उड़ते देखना चाहता हूँ,

करी है नयी शुरुआत, फिर साथ तुम्हारा चाहता हूँ

ठहरो कुछ देर

थम गयी है ख़त्म ना होने वाली दौड़, सोचा ना था कि ऐसा भी आ सकता है एक मोड़

सर्व शक्तिमान को एक सूक्ष्म ने दिया है तोड़, क्या प्रकृति सिखा रही है अब रहना है दिलों को जोड़?

शांत है गगन और चुप है धरा…नज़रें घूमाईं तो देखा मुन्नी के चित्रों में है जादू भरा…ना जाने ये सब कब रचा, मैं तो सदा ही रहा थका थका

सुना आज देर तक चिड़ियों का संगीत…कह रहीं हैं…मुस्कुराओ, ये वक्त भी जाएगा बीत

साँसों को भी अपनी आज छुआ, साँसों को भी अपनी आज छुआ, इनकी गहराइयों में ही तो है जीवन दर्शन छुपा। कहाँ कहाँ हो आया मैं ढूँढते तुम्हें, मुझ जैसा कोई मूर्ख ना हुआ

माँगता रहा तुमसे रोज़…मंदिर और गिरजाओं में रहा था तुम्हें खोज। अलमारी में सदा से रखी वो सबसे छोटी किताब, यूँ ही आज उठा ली और मिले आप कहते गीता सार

थम गयी है ख़त्म ना होने वाली दौड़, शायद ज़रूरी ही था ये मोड़

गहरी काली है यह रात, नयी सुबह से पहले सिखा रही है एक ज़रूरी बात

ख़त्म हो नफ़रत, सिर्फ़ प्यार बढ़े, ख़त्म हो नफ़रत, सिर्फ़ प्यार बढ़े, प्रकृति माँ है, मत दो उसे ज़ख़्म गहरे

ठहरो कुछ देर, जानो तुम कौन हो, रोटी का यंत्र नहीं, तुम रचेयता का पुरस्कार हो

ठहरो कुछ देर, जानो तुम कौन हो, तुम ही हो ब्रह्म और तुम ही अवतार हो…जीवन आनंद का तुम ही समागम हो

ठहरो कुछ देर, जानो तुम कौन हो

विश्व तीर्थ

क्यूँ कर जाऊँ मैं काशी द्वारका हरिद्वार , क्यूँ करूँ तीर्थ मैं जीवन में बस एक बार

क्यूँ कर जाऊँ मैं काशी द्वारका हरिद्वार , क्यूँ करूँ तीर्थ मैं जीवन में बस एक बार

विश्वास भक्ति करुणा की नित्य है पुकार; विश्वास भक्ति करुणा की नित्य है पुकार, नित्य ही कैसे तीर्थ हो आऊं और करूँ अपना उद्धार

उठो देखो प्रकाशमय हो रहा है फिर संसार ; उठो देखो प्रकाशमय हो रहा है फिर संसार, तेजोमय सूर्य बिखेर रहा है आशा की किरणें हज़ार

समस्त जीव कर रहे सूर्य तीर्थ को स्वागत नमस्कार

उठो देखो प्रकाशमय हो रहा है फिर संसार, काशी द्वारका हरिद्वार भी अर्पण कर रहे सूर्य तीर्थ को अपना परोपकार

सूर्य विश्व तीर्थ है, ब्रह्मांड का जीवन प्रतीक है; सूर्य विश्व तीर्थ है, ब्रह्मांड का जीवन प्रतीक है

स्थिर गम्भीर अब चित् है, स्थिर गम्भीर अब चित् है

सूर्य ही जीवन तीर्थ है

दिल का पुल

एक खाई है जो हम दोनों ने आज बनाई है, एक खाई है जो हम दोनों ने आज बनाई है; नफ़रत की कुदाल से दूरी और बढ़ाई है

एक खाई है जो हम दोनों ने आज बनाई है, नफ़रत की कुदाल से दूरी और बढ़ाई है

ग़िले यूँ तो बहुत हैं, हर गहरे ख़्वाब के क़ातिल हैं; ग़िले यूँ तो बहुत हैं, हर गहरे ख़्वाब के क़ातिल हैं

दिल फ़िर भी दुखः रहा है तुम्हारे लिये, गहरे ख़्वाब में एक हसीन याद के लिए। दिल फ़िर भी दुखः रहा है तुम्हारे लिये, गहरे ख़्वाब में एक हसीन याद के लिए

एक खाई है जो जज़्बात ने बनाई है, एक पुल है जो दिल ने बना दिया है

कल ख़्वाब में वो पुल पार किया हम दोनों ने, उस खाई को सदा के लिए भुला दिया हम दोनों ने

आज ये ख़्वाब हक़ीक़त बन जाए, दुआ बनकर हम पर बरस जाये; आज ये ख़्वाब हक़ीक़त बन जाए , दुआ बनकर हम पर बरस जाये

हर ग़िले की खाई को सदा के लिए भर जाये, दिल के इस अनदेखे पुल को ख़ुशनुमा यादों से सरोबार कर जाये

मेघ कान्हा

मेघ धरा लिप्त हैं आज मिलन ऋतु की वर्षा में, झूम रहीं हैं वृक्ष गोपियाँ कान्हा के प्रेम की बरखा में

मेघ धरा लिप्त हैं आज मिलन ऋतु की वर्षा में,झूम रही हैं वृक्ष गोपियाँ कान्हा के प्रेम की बरखा में

तपती विरह का अंत है आज, हर रूठी गोपी कान्हा में लिप्त है आज, हरी ओढ़नी के स्वागत आलिंगन में झूम रही है वायु आज

बरखा प्रेम धुन मल्हार है, अमृत संगीत गूँज रहा हर तरफ़ आज; हर कण के साथ रास कर रहे मोरे कान्हा आज

बरसो कान्हा बरसो, स्वागत है बरसो, तरसे नैना भीग रहे हैं आज बाद बरसों

सम्पूर्ण धरा वृंदावन है आज बरसो, हर कण राधा है आज बरसो

स्वागत है कान्हा बरसो

महकता बचपन

एक बचपन दिखा आज…खोया सा, रोया सा, मुरझाया सा; रज़ाई की गर्माइश को ललचाता…ठिठुरा सा, सकुचाया सा

कूड़े के ढेर में सुक़ून तलाशता, थकी आँखों से एक ख़ामोश सवाल पूछता

इंसानी दरज़ों से समझौता सा करता, इस जहाँ में अपनी जगह टटोलता

बचपन में बचपने से अनजान, टूटे हुए गुड्डे गुड़ियों के लिए बनाता रेत का एक मकान; खिलखिलाते महकते बच्चों को देख के हैरान

आसमाँ से पूछता, क्यूँ ये सज़ा दी है मुझे भगवान; दूर क्षितिज के एक स्वप्न में ढूँढता अपना मकान

पूछा, क्या सोच रहे हो…भूखे हो इसलिए रो रहे हो? ये बचा हुआ खाना लो…अक्सर यहीं से जाता हूँ, मेरी गाड़ी को पहचान लो…ये कुछ पैसे भी लो

बोला, हाथ फैले हैं आज ज़रूर मेरे, भूख से रो रहे हैं भाई मेरे। अंधेरी सड़क के कोने में माँ फ़िर सिल रही है पेवंद क़मीज़ के मेरे

बोला, हाथ फैले हैं आज ज़रूर मेरे, भूख से रो रहे हैं भाई मेरे। अंधेरी सड़क के कोने में माँ फ़िर सिल रही है पैबंद क़मीज़ के मेरे

थका हूँ…मायूस नहीं हूँ, मुरझाया हूँ…मरा नहीं हूँ

बहुत हुआ रोना…अपनी क़िस्मत को कोसना; उठूँगा इन्हीं रास्तों से, दूर क्षितिज का वो स्वप्न साकार करूँगा मैं

उठूँगा इन्हीं रास्तों से, दूर क्षितिज का वो स्वप्न साकार करूँगा मैं

भीख नहीं साथ दीजिए…मुझे भी खिलने का एक मौक़ा दीजिए; भीख नहीं साथ दीजिए…मुझे भी खिलने का एक मौक़ा दीजिए

महकूँगा मैं तो खिलखिलायेगा ये चमन, महकूँगा मैं तो खिलखिलायेगा ये चमन…कितना ख़ूबसूरत हो जाएगा ये वतन… कितना ख़ूबसूरत हो जाएगा ये वतन।

अधूरा मैं

क्या अधूरा हूँ मैं…ख़ुद से रूबरू अभी हुआ नहीं हूँ मैं; क्या अधूरा हूँ मैं…ख़ुद से रूबरू अभी हुआ नहीं हूँ मैं

नये पन्ने उलट रहे हैं रहस्यमयी किताब के, मुख़्तलिफ़ मुलाक़ातें करवा रहे हैं खुद अपने ही आप से

कहाँ छुपे थे तुम…शायद किसी से डरे हुए थे तुम; क्या सही वक्त का इंतज़ार कर रहे थे…या मुझे आज के लिये तय्यार कर रहे थे

दो पल रूठा था मैं तुमसे…क्यूँ देर कर दी मिलने में मुझसे। दो पल रूठा था मैं तुमसे…क्यूँ देर कर दी मिलने में मुझसे

पर तुम तो अपने हो…मेरे ही प्रतिबिम्ब हो, देर से ही सही, अब तुम खिल तो रहे हो

हाँ अधूरा था मैं…खुद से रूबरू नहीं हुआ था मैं। हाँ अधूरा था मैं…खुद से रूबरू नहीं हुआ था मैं

अब नये पन्नों का है इंतज़ार…नयी जीवन रचना का सृजन कर पाऊँ फ़िर एक बार। अब नये पन्नों का है इंतज़ार…नयी जीवन रचना का सृजन कर पाऊँ फ़िर एक बार

सदा अधूरा ही रहूँ, ख़ुद से नयी मुलाक़ातें यूँ ही करता रहूँ

एक नयी पहचान यूँ ही बनाता रहूँ…एक नयी शख़्सियत यूँ ही निखारता रहूँ

अनगिनत तारों का क़स्बा

क़स्बा है एक, दो बसों के सफ़र दूर, पहुँचते ही जहां मैं जाया करता था बेहद रूठ

ना पहाड़, ना समुंदर, ना जंगल…बीती हैं बचपन की छुट्टियाँ करते मच्छरों से दंगल

धूल, गोबर और कूड़ा…बचते बचाते चलो नहीं तो सन जाओगे पूरा

बल्ब और पंखों की सदा थी गर्मियों की छुट्टी…कभी क़भार आ के बिजली झुंझला देती, उड़ा डालती बरसों से पटी मिट्टी

मैं लौंडा, बहन लौंडिया…अनोखी भाषा ने शब्दावली को पूरा धो दिया

दिवाली पे सिर्फ़ दियों की रोशनी…बल्ब पंखों की चल ही रही होती थी आँख मिचौनी

वक्त धीमा नहीं रुका हुआ सा लगता…दिन कभी ख़त्म ही नहीं होता दीखता

ये था क़स्बा, दो बसों के सफ़र दूर, पहुँचते ही जहां मैं जाया करता था बेहद रूठ

दूर हूँ बहुत अब उससे, हम दोनों बड़े हुए पर टूटे नहीं हमारे रिश्ते

अलौकिक थी दिवाली पे सिर्फ़ दियों की रोशनी; बीसियों घरों में जाना, करना सबसे मिलनी… उपहार में मिलें ढेरों गुजिया, मठरी, फिरनी

आज रोशनी बहुत है, पर कुल के बड़े थोड़े भी नहीं; मिठाई अनगिनत हैं, पर हाथ का स्वाद नहीं

धीमे वक्त के लिए तरस रहा हूँ आज, काश उस ट्यूबवेल में तर हो आऊँ फिर आज; अरे, सिंघाड़े का खेत भी तो था वहीं कहीं पास

अनगिनत तारों की रात की बात बताई अपनी बेटी को आज; हैरानी से कहती, क्यूँ मज़ाक़ कर रहे हो आप

भला धूल के बादल के पार दिखी है कभी साफ़ रात, अब कैसे ले जाऊँ उसे दिखाने गर्मी की वो चमचमाती रात

गुरुद्वारा मस्जिद साथ में गाते, सामने ही राम लीला के नज़ारे, लकड़ी के तीर कमान सभी बच्चे चलाते; त्योहार एकता के प्रतीक, ये अनमोल सीख सिखाते

अब शहर बना वो क़स्बा, दो बसों के सफ़र दूर; विलीन हुए जहां पूर्वज, हो गए हमेशा को दूर

ये यादें ज़िंदा रखूँ, ना जाऊँ उस क़स्बे को कभी भूल; ये यादें ज़िंदा रखूँ, ना जाऊँ उस क़स्बे को कभी भूल

यही होंगे मेरे श्रधांजलि के फूल…मेरी कृतज्ञता के फूल

सुकून के धीमे पल

याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल, तसव्वुर में हो जाये जैसे एक हसीन ख़्वाब शामिल

थके ज़हन पर मरहम सा बहता एक सर्द सफ़ेद कोहरा, और याद आ जाये बीती जवानी का एक बज़्म ए यारां

ॐ अल्लाह हू जब गूंजें एक साथ… ॐ अल्लाह हू जब गूंजें एक साथ, और पुरसुकूँ सजदे में आँख भर आये ख़ुद हर बार

वो रेल की खिड़की से दूर दिखता छोटा सा गाँव, गुज़रती नज़र में ही बुन लेना एक हसीन पड़ाव

वो बादशाह की मोहब्बत का निशाँ…वो ख़ुदाई नूर का निगहबाँ, वो बादशाह की मोहब्बत का निशाँ…वो ख़ुदाई नूर का निगहबाँ

शफ़्फ़ाक पत्थर में धड़कती एक रूहानी दास्ताँ, चाँद रात का फ़रिश्ता, ख़्वाब में भी कर देता मुझे बेज़ुबाँ

संजोई है अब तक बरसते अब्र की वो सौंधी ख़ुशबू, भीगे दरख़्त से बिखरती गीली हवा से भी हुआ था मैं रुबरू

याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल…मेरे अपने हैं ये यादगार पल, याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल…मेरे अपने हैं ये यादगार पल

ढूँड लेता हूँ ख़ुद को इनमें, खो भी जाता हूँ इनमें, हक़ीक़त की जद्दो जहद को भुला आता हूँ इनमें

एक नयी याद जोड़ने का वादा कर आता हूँ मैं; यूँ हीं फिर ज़िंदा हो जाता हूँ मैं…फिर ज़िंदा हो जाता हूँ मैं

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