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जज़्बातों की पहचान

जज़्बातों की पहचान

की अपने पहचानें तुम्हें, ये ज़रूरी नहीं, गूँगे ज़ख्मों को सुन पाएँ, ये ज़रूरी नहीं; की अपने पहचानें तुम्हें, ये ज़रूरी नहीं, गूँगे ज़ख्मों को सुन पाएँ, ये ज़रूरी नहीं

सुकून ए ज़िंदगी की शर्तें हैं बहुत…सब पूरी हो जाएँ ये ज़रूरी नहीं

आँधियों को उम्मीद थी थमने की…आँधियों को उम्मीद थी थमने की 

हर उम्मीद मुकम्मल हो जाए ये ज़रूरी नहीं 

थको मत कि उजाड़ने हैं तुम्हें कई ख़्वाब अभी…थको मत कि उजाड़ने हैं तुम्हें कई ख़्वाब अभी

इस वीराने पे कोई रोए, ये ज़रूरी नहीं 

अरमाँ तनहा हैं साहिल पर, वक़्त का दरिया बहे  जाता है; अरमाँ तनहा हैं साहिल पर, वक़्त का दरिया बहे  जाता है, 

तैरना हर कश्ती की तक़दीर नहीं; डूबते सपनों की शिद्दत कुछ कम थी, ये ज़रूरी नहीं  

दुनिया के बाज़ार दरखिशां हैं बहुत, सब बिकता है यहाँ;

दुनिया के बाज़ार दरखिशां हैं बहुत, सब बिकता है यहाँ, आसामियों का ताँता है, देखिए जहां तहाँ 

जज़्बातों की भी दुकान लगी है अंधेरे कोने में, 

जज़्बातों की भी दुकान लगी है अंधेरे कोने में, कोई ख़रीदार दिखता नहीं वहाँ

क्या मोल है यादों के इन पुलिंदों का, क्या मोल है यादों के इन पुलिंदों का

जो पहचान पाए, वो ख़रीदार ही कहाँ 

कौड़ियों में ले जाएगा कोई इनको, कौड़ियों में ले जाएगा कोई इनको

किसी दीवाने का फ़साना समझ के खिलखिलाएगा फिर वो

हर जज़्बात की क़ीमत अदा हो ये ज़रूरी नहीं, की अपने पहचानें तुम्हें, ये ज़रूरी नहीं 

गूँगे ज़ख्मों को सुन पाएँ, ये ज़रूरी नहीं

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सुकून के धीमे पल

याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल, तसव्वुर में हो जाये जैसे एक हसीन ख़्वाब शामिल

थके ज़हन पर मरहम सा बहता एक सर्द सफ़ेद कोहरा, और याद आ जाये बीती जवानी का एक बज़्म ए यारां

ॐ अल्लाह हू जब गूंजें एक साथ… ॐ अल्लाह हू जब गूंजें एक साथ, और पुरसुकूँ सजदे में आँख भर आये ख़ुद हर बार

वो रेल की खिड़की से दूर दिखता छोटा सा गाँव, गुज़रती नज़र में ही बुन लेना एक हसीन पड़ाव

वो बादशाह की मोहब्बत का निशाँ…वो ख़ुदाई नूर का निगहबाँ, वो बादशाह की मोहब्बत का निशाँ…वो ख़ुदाई नूर का निगहबाँ

शफ़्फ़ाक पत्थर में धड़कती एक रूहानी दास्ताँ, चाँद रात का फ़रिश्ता, ख़्वाब में भी कर देता मुझे बेज़ुबाँ

संजोई है अब तक बरसते अब्र की वो सौंधी ख़ुशबू, भीगे दरख़्त से बिखरती गीली हवा से भी हुआ था मैं रुबरू

याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल…मेरे अपने हैं ये यादगार पल, याद हैं मुझे सुकून के ये धीमे पल…मेरे अपने हैं ये यादगार पल

ढूँड लेता हूँ ख़ुद को इनमें, खो भी जाता हूँ इनमें, हक़ीक़त की जद्दो जहद को भुला आता हूँ इनमें

एक नयी याद जोड़ने का वादा कर आता हूँ मैं; यूँ हीं फिर ज़िंदा हो जाता हूँ मैं…फिर ज़िंदा हो जाता हूँ मैं

तुम्हारे जाने के बाद

कुछ मासूम पल याद आये आज तुम्हारे जाने के बाद 

एक उम्र पहले दिखे थे तुम…एक उम्र पहले दिखे थे तुम

आज मिले भी तो गुज़र जाने के बाद?

सच है की भूला नहीं था मैं तुम्हें…सच है की भूला नहीं था मैं तुम्हें…

आज याद तो मग़र तुम आए भूल ही जाने के बाद 

ख़फ़ा ख़ुद से हों या ज़िंदगी से…सज़ा दें तो किसे दें

ख़फ़ा ख़ुद से हों या ज़िंदगी से…सज़ा दें तो किसे दें …मुजरिम ढूँढ रहे हैं सब खो जाने के बाद 

ये लफ़्ज़ पहुँचेंगे तुम तक, ये सोच कर तसल्ली दे रहे हैं ख़ुद को…

ये लफ़्ज़ पहुँचेंगे तुम तक, ये सोच कर तसल्ली दे रहे हैं ख़ुद को…वहम का सहारा ले रहे हैं हक़ीक़त ख़त्म हो जाने के बाद  

और कितने पलों पे रोएँगे, सब बह जाने के बाद 

नूर ए ख़ुदा

शाइस्ता है मोहब्बत, हर ज़ुल्म पे मुस्कुरा देती है…शाइस्ता है मोहब्बत, हर ज़ुल्म पे मुस्कुरा देती है

नासमझ है तू, ये समझ के माफ़ कर देती है

कितने पहाड़ कितने मील ज़ाया किए तूने…कितने पहाड़ कितने मील ज़ाया किए तूने

ख़ुदा तो ख़ुद ही में है, ये पहचाना नहीं तूने

सजदे में किसके झुकता है हर रोज़…सजदे में किसके झुकता है हर रोज़

दिखता नहीं, एक एहसास है वो…हमेशा तेरे पास है वो; पहचान उसे…पहचान उसे, नहीं तो हर सजदा है बस एक अफ़सोस

रात अंधेरी नहीं है मोमिन…वो नूर अब भी रोशन है तुझमें

रात अंधेरी नहीं है मोमिन…वो नूर अब भी रोशन है मुझमें

बस हटे अब ये नफ़रत की गर्द, बहुत हुई इंसानियत ज़र्द

क़द ओ कामत ख़ुदा सा है जिसका… क़द ओ कामत ख़ुदा सा है जिसका; मोहब्बत ही है नाम उसका

मोहब्बत ही है मज़हब…मोहब्बत ही है दीन…मोहब्बत ही है वो नूर जिसे ढूँढते भटका तू कितना दूर

ये शमा ना बुझे अब…रोशन रहे ये जहां अब; ये शमा ना बुझे अब…रोशन रहे ये जहां अब

शाइस्ता है मोहब्बत…बस सुकून में रहे इनसाँ अब

ज़िन्दगी

कुछ यूँ तो नहीं बुननी चाही थी ज़िंदगी

ख़्वाबों के रेशम पर हक़ीक़त के पैवंद खींचती, मजबूर ज़िंदगी

गुत्थियों से जूझती, पल पल उलझती, उधड़ती ज़िंदगी; जवाबों से डरती, सकपकायी, हैरान ज़िंदगी

कौन खींच रहा है ये डोर; लेते गए क्यूँ ग़लत मोड़

किसपे खीजें ये समझ नहीं आता; शायद जानते हैं, पर हिम्मत नहीं जुटा पाता; किसपे खीजें ये समझ नहीं आता; शायद जानते हैं, पर हिम्मत नहीं जुटा पाता

वक़्त से या रब से गुहारें, किस शमशान में उन क़त्ल पलों को पुकारें; डरता हूँ कहीं जाग ना जाएँ, मुझे आईना ना दिखा जाएँ

अजीब कैफ़ियत है ये, इंसान यूँ ही क़ुर्बान हैं रिवायतों पे

दफ़नाते रहो दर्द को, जलाते रहो अरमानों को; दफ़नाते रहो दर्द को, जलाते रहो अरमानों को

ख़ुशियाँ तो एक सराब हैं, तुम मिटाते चलो हर जज़्बात को

कुछ यूँ तो नहीं बुननी चाही थी ज़िंदगी; बस गुज़रती, पछताती ज़िंदगी

मुस्कुराहट की आहट से भागती, ग़म को ही अपना आशिक़ समझती, बस भटकती सी ज़िंदगी

आसां नहीं है ख़ुशियों के घरोंदे तक का सफ़र; आसां नहीं है ख़ुशियों के घरोंदे तक का सफ़र

सौदागर है तक़दीर, ग़म के सिक्कों की ही करती है कद्र; सौदागर है तक़दीर, ग़म के सिक्कों की ही करती है कद्र

ज़िंदगी रहती है तो रहे बेसब्र

सफ़र में कुछ फूल भी मग़र खिलाए हैं…ऐसा नहीं की बस आँसू ही बहाए हैं

तक़दीर उतनी भी बेज़ार नहीं अभी…सोचा तो लगा वो घरोनदा कहीं मुझमें ही तो नहीं…

अब धूल ना पड़ने पाए इन फूलों पर…अब धूल ना पड़ने पाए इन फूलों पर

ज़िंदगी का अब यही पैग़ाम तो नहीं

मोहब्बत

जन्नत देखूँगा ये सोच के घर से निकला था; नयी मोहब्बत ढूँढूँगा ये सोच के घर से निकला था

जन्नत देखूँगा ये सोच के घर से निकला था; नयी मोहब्बत ढूँढूँगा ये सोच के घर से निकला था

तुझे भूल जाऊँगा; बेवफ़ा हो जाऊँगा

पर ये तेरी ही मीठी साज़िश है; हाँ, ये तेरी ही मीठी साज़िश है

की राहें बदल गयीं; मोड़ मुड़ गये और दर पे तेरे हम फिर आ गए

अब, दिल को सुकून तो मेरे भी है; अब, दिल को सुकून तो मेरे भी है;

सच है मोहब्बत तुझसे मुझे अब भी है

एक आग

एक आग है भभकती धधकती, एक आग है भभकती धधकती

ज़हन ज़ुबान ज़हानत को निगलती बेरंग सी अनदेखी सी, ज़हन ज़ुबान ज़हानत को निगलती बेरंग सी अनदेखी सी

नफ़रत के रेगिस्तान में सरफ़रोशी का सरब दिखाती, केसरिया और हरे को सफेदा अमन भुलवाती

बुझाने वालों को ग़द्दार बताती

एक आग है भभकती धधकती, एक आग है भभकती धधकती

दफ़्न इंसानियत

कौन हो तुम, क्यूँ बिखरे हुए हो सड़कों पे तुम, कौन हो तुम, क्यूँ बिखरे हुए हो सड़कों पे तुम

क्यूँ आज के क़िस्सों का हिस्सा हो, क्यूँ शाम मेरी ज़ाया कर रहे हो

जोड़ी होंगी ईंटें मेरे आशियाने की कभी, सींची होगी वो ख़ुशबू बिखेरती बग़ीचि तभी

ढोया होगा कभी मेरा बोझ…अपने भुला के, झुलाये होंगे बच्चे मेरे तुमने रोज़

देखे होंगे मेरे नख़रे, जब सपने थे तुम्हारे बिख़रे; साफ़ की होगी जन्नत की चौखट, ना घुस पाने पर रोया होगा लाल तुमसे लिपट

मेहनताना तो दिया था, फिर क्यूँ जताऊँ अब अफ़सोस

चलना है तो चलो मीलों, बच्चों को भी साथ खींच लो, रात में अदृश्य हो के चलना था पर…रात में अदृश्य हो के चलना था पर

तुम जैसे जीव भी हैं सुंदर शहर में, यूँ उजाले को ग्रहण नहीं लगने देना था पर, शहर के अंधेरे कोनों में छिपे रहना था… ज़िंदा हो पता नहीं लगने देना था

यूँ ही मचा है हो हल्ला, यूँ ही मचा है हो हल्ला, अच्छा है ख़ाली हो गया गंदा मोहल्ला

तू गया तो क्या…हज़ारों आएँगे पूछते, बाबूजी कोई काम है क्या?

यही सच है ये जानता हूँ, दिल को भी यही समझता हूँ, नाराज़ तुमसे हूँ या ख़ुद से, बस ये नहीं समझ पा रहा हूँ

एक बेचैनी है…तुम्हारे लिए उठती टीस नहीं, तुम पर बरसती खीज है, दफ़ना दी थी जो इंसानियत, उस कब्र पर जमी मिट्टी क्यूँ झड़ी है

कहीं ज़िंदा तो नहीं वो…तुम्हें देख के छटपटा तो नहीं रही वो

दफ़्न रहे तो अच्छा है…दफ़्न रहे तो अच्छा है, बाहर घुप्प अंधेरा है

इंसान मर चुका है, बस एक बड़ा बाज़ार सजा है, सब बिकता है जहां…हम नहीं, पैसा है व्यापारी यहाँ

दफ़्न रहे तो अच्छा है, रोज़ बिकते देख मुझे रोने से तो अच्छा है

जाओ तुम अपने गाँव, देखना ये बाज़ार वहाँ ना फैला पाये अपने पाओं

एक नयी इमारत बनाना, चौखट पार सबको आने देना, कबरिस्तनों को दफ़ना कर, ख़ुदा के इंसान की बग़ीची खिलाना

मुझे याद से भुला देना…मिटा देना, दफ़ना देना

वो मकाँ

मेरी छोटी ख़ुशियों और बड़े सहम का निगहबाँ, वो मेरी उम्र का मकाँ

किसी बचपन को फिर जवाँ करता…किनहि पलों की उम्र फिर दराज़ करता वो चुप सा मकाँ

जवाँ हसरतों और बूढ़े तवककों का गवाह वो छोटा सा, बड़ा मकाँ

अपनी सासों को रोके हुआ, वो ज़िंदा सा मकाँ

आज भी मुझे पहचानता, बड़े दरखत जैसा वो साकिन मकाँ

मुझ पर मुस्कुराता सा हुआ, मेरी यादों का वो यादगार मकाँ

मेरे नए घर को नसीहत देता हुआ, वो माँ जैसा मेरी उम्र का मकाँ

वो कोहरा

तेरे उस सफ़ेद कोहरे ने ही तो निखारी थी मेरी मोहब्बत

वो गलियाँ याद हैं; तेरी सर्द सर्दी में गुल्फ़ाम होना भी याद है

तेरे उस सफ़ेद कोहरे ने ही तो निखारी थी मेरी मोहब्बत

वो गलियाँ याद हैं; तेरी सर्द सर्दी में गुल्फ़ाम होना भी याद है

और याद है मेरी बेवफ़ाई; वो गलियाँ रूठ गयीं, वो कोहरा बिखर गया

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